शुक्रवार रात को मैंने एक हिन्दुस्तानी फ़िल्म देखी । वह बॉलीवूड की फ़िल्म नहीं है । उसका नाम "वाटर" है (भारत में उसका नाम "१९४७" है) । जब मैंने पहली बार उसका "ट्रेलर" देखा , तब मैं गंभीर फ़िल्म देखने तैयार नहीं था । लेकिन शुक्रवार रात को मैंने कुछ हिन्दी सुनना चाहा , और मैं भूला कि वह एक गंभीर फ़िल्म थी । उसकी कहानी बहुत उदास है , लेकिन हिन्दुसतान के विभाजन की कहानियाँ सब बहुत उदास हैं । जब दोस्त धार्मिक कारण के लिए अपने दोस्तों को मार डालते हैं , तब दुनिया में कम आशा है । बाद में मैं एक छोटी मिठाई बनाकर फ़्लम के बारे में ज़्यादा सोचकर सो गया । लेकिन जब से मैंने यह फ़िल्म देखी, तब से मैं भारत के बारे में ज़्यादा सोच रहा हूँ । मैं इस देश के बारे में बहुत नहीं जानता हूँ , मैं कभी उसके बहुत-सारे लोगों के बारे में नहीं जानता हूँ । ज़रूर मैं कुछ हिन्दुस्तानी खाना जानता हूँ , (और आजकल मैं बहुत हिन्दुसतानी खाना बनाता हूँ) , औार मैं कुछ अम्रीकानी-हिन्दुस्तानियों से मिला हूँ । लेकिन मैं कभी भारत नहीं गया हूँ । देश के लोग , खाना , और संस्कृति समझने हमें वहाँ जाना हैं । शायद मैं मई यह सचमुच दिलचस्प देश जा सकूँगा ।
Sunday, March 8, 2009
Sunday, March 1, 2009
दो औरतें
इन दो औरतों को छोड़कर सब लोग कमरे से निकल गए हैं । पहली औरत ने दुसरी को देखा , और पहले दो मिनटों में वह कुछ नहीं कह पाई । अगर उसने दुसरी से एक शब्द ही कहा , तो वह रोती हो । लेकिन यह महिला काफ़ी रो चुकी है , तो उसने अंत में पूछा : "आपने मेरे पति को अच्छी तरह जाना, न ?" दुसरी औरत ने उसे देखकर कहा , "जी हाँ ।" पहली औरत ने पूछा : "और आपको मालूम भी है कि हमारे दो बेटे हैं ?" इस समय दुसरी औरत उसे नहीं देख सकी । तब उसने जवाब दिया : "मैं सिर्फ़ बाद में समझ गई ।" वह बैठ गई और उसने अगले सवाल के इंतज़ार किया । " लेकिन आप उससे मिलते रहीं , हालाँकि वह शादी-शुदा था और उसके बेटे थे ?" दुसरी औरत ने कुछ नहीं कहा । विधवा ने अपने कोट से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर अपने पति की प्रेमिका को यह थमाया । "मैं सोचती हूँ कि मेरे पति ने यह आपके लिए लिखा था , मैंने उसके सोने के कमरे में यह पाया । क्या यह आपका नाम है ?" जवान औरत ने लिफ़ाफ़ा ले लिया और उसकी आँखें लाल हो गईं । "अपने आँसू मुझे न दिखाओ ; मैंने आपके कारण बहुत आँसू बहाए , जो आँसू आपने कभी नहीं देखे हैं ।" विधवा कहकर निकल गई , लेकिन जवान औरत ने उसको नहीं सुना ; वह लिफ़ाफ़ा नहीं खोल पाई , सिर्फ़ वह यह छू रही थी और सोच रही थी , और धीरे-धीरे आँसू निकल आए ।
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