Monday, April 6, 2009
जूते के बिना
कल मुझसे कहा गया कि दिल्ली में बहुत-से ग़रीब लोगों के पास जूते नहीं हैं । मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । जब मैं लोगों के बारे में सोचता हूँ जिन के पास जूते नहीं हैं तब मैं अफ़्रीकी गंव कल्पना करता हूँ , लेकिन एक दुन्या सब से बहुत बड़े अर्थशास्त्र के राजधानी में नहीं । डेढ़ साल पहले मैं काफ़ी-से चीनी गंवों में सफ़र कर रहा था , और मैंने कभी लोगों को देखा जिन ही के पास जूते नहीं थे (कुछ बच्चों को छोड़कर , जो जूते पहनना नहीं चाहते थे) । शायद आप पूछ रहे हों कि जूते पहनना क्यों अहम हैं । मेरे लिए जूते प्रतीक हैं । बहुत भारती कहते हैं कि अपना देश चीन से ज़्यादा शक्तिशाली होगा , कि वह दुन्या की अगली अतिशक्ति होगा । लेकिन ये लोग ज़्यादा ग़रीब नहीं हैं , या वे आम लोगों की ज़िन्दगियाँ नहीं समझना चाहते हैं । अभी भारत में बहुत लोगों के पास जूते नहीं , और उनके पास अच्छी तबियत भी नहीं , घर भी नहीं , काफ़ी शिक्षित भी नहीं । बहुत बच्चे मर जाते हैं , कुछ अफ़्रीकी देशों में से ज्यादा । लेकिन मैंने कभी भारत में सफ़र नहीं किया है , तो मुझे आशा है कि जब मैं यह बड़ा देश जाऊँगा तब मैं बेहतर समझऊँगा । शायद मई को ! शायद तब मैं देखना सकूँगा कि कितने लोगों के पास जूते नहीं होंगे ।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment