Tuesday, October 13, 2009

लखनउइ रिकशेवाले

लखनऊ की सड़कों में अलग अलग लोग हैं , जिनकी तरह तरह के काम हैं । मैंने कुछ काम देखे, जो मुझे बहुत उदास कए ; जवान आदमी मलजल खोद रहे थे , बच्चे फल और सबज़ियाँ बेच रहे थे , बूढ़ी बूढ़ी औरतें रहियों के लिए अनाज भून रही थीं । इस शाहर में आप या तो काफ़ी अमीर हों या कहीं ग़रीब । इन ग़रीब लोगों के बीच एक तरह मुझे हामेशा याद रहती है : रिक्शेवाले । जब मैं उस शहर रह रहा था , हर दिन मुझे रिकशे का इस्तेमाल करना था , और सड़कों में आप बहुत-से रिकशे देखते हैं । ये आदमी साथ-वाले ग़ावों से आते हैं । उनके पास न पैसा न शिक्षा है , इस लिए वह काम करने अपने शरीर ही का निर्भर कर सकते हैं । जब मौसम गरम गरम था , जब कोई बहर रह नहीं पाता है , मैं अपने ए.सी. गाड़ी के अन्दार से कई रिक्शेवाले देख सका , जो उस गर्मी तो में ग्राहकों की तलाश कर रहे थे । एक रिक्शेवाले का मुख मुझे याद आता है ; बहुत थकावट था लेकिन बहुत दृढ़था भी थी ; उसके आँखें मुझसे बता रहे थीं कि मौसम चाहे कितना गरम हो , ग्राहक चाहे कितने अनुदार और मोटे हों , और ज़िंदगी चाहे कितनी मुश्किल हो , उसे अपना रिक्शा चला रहना था । एक दिन मैं रिक्शेवालों के बारे में ज़्यादा सीखना चाहता हूँ ।

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